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दौलताबाद किल्ला,देवगीरी फोर्ट जानकारी

 महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में औरंगाबाद से लगभग करीब 17-18 कि।मि।की दुरी पर दौलताबाद किल्ला हैं ।इसे देवगीरी फोर्ट भी कहा जाता है पहले इस किल्ले  का नाम देवगिरी किला था यह यादवों की राजधानी थी  महाराष्ट्र के साथ आश्चर्य में से एक आश्चर्य यह किल्ला हैं।जिसको मोहम्मद बिन तुगलक ने बदल कर दौलताबाद रखा था इसका मतलब है दौलत से आबाद है। इस  किल्लेको को सब लोग दौलताबाद के नाम से जानते हैं इस किले को किसने बनवाया था.यादव काल में बनाया गया जो कि ऊंचे पहाड़ पर बना है इसके किल्ले को देखने  सहाशे शिडीया है। यहां पर पार्कीग की सुविधाएं है में दरवाजे से पहले तिकीट घर हैं वहां                      भारतीय लोगों के लिए 25 रूपीया , विदेशीऔ के लिए 300 रूपए और कैमरा के लिए 25 रूपीया देता पड़ता किल्ला भारतीय पुरातत्व विभाग के तहत आता है . इसलिए की इस किल्ले में अवैध रूप से घुस पाना मुश्किल था क्योंकि.यहां चट्टानों को काटकर बनाया गया है 200 मीटर ऊंचे इसकी दीवारें और दरवाजे इतने मजबूत है कि कहीं हाथी मिलकर भी इसे तोड़ पाना मुश्किल था.इस किले की सारी बनावट में से एक है इसके लिए का मुख्य दरवाजा जो कि लगभग 688 फीट ऊंचा है जिसे होते हुए आपको किल्ले के अंतिम ऊंचाई पर पहुंचने के लिए लगभग 2 किलोमीटर चलना होगा.इसके लिए के दरवाजे पर हमेशा तो पर तैनात रखी जाती थी जिसमें से अंतिम दरवाजे पर आज भी 16 फीट लंबी और 2 फीट  गोलमेंढा नाम की तोफ है 



जो आज भी देखने मिलती है. जो कि लगभग 3:50 किलोमीटर तक निशाना लगा सकती है इस किल्ले के अंदर एक मीनार है जो की इं स 1435 में मशहूर बहमनी राजा अलाउद्दीन बहमनी शाह ने बनवाया था.उन्होंने चारमीनार रहा इसकी ऊंचाई लगभग 63 मीटर ऊंची है जिस पर अलग अलग तरीके की कारीगरी की गई है इन मिनार के ठीक पीछे जामा मस्जिद है जिसके पास एक चीनी महल  है जहां पर गोलकुंडा के अंतिम राजा अब्दुल हसन तानाशाह  1687 में औरंगजेब ने कैद था.इस जगह सुरंग.जो कि 150 फुट लंबी है जिसमें जगह-जगह गड्ढे है जोकि उसके दुश्मनों के लिए बनाए गये है।.इस लिए कि चारों और गहरी खाई है जो कि हमेशा मगरमच्छों से भरी होती थी जिसके कारण दुश्मन यहां तक आना नहीं पाते थे।.



         सन 1137  में इस किल्ले को बनवाया गया जोकि यादव काल में मिल्लत राजा ने बनवाया था उसके बाद कृष्णा के बेटे राम चंद्र देव के राज में अलाउद्दीन खिलजी ने सन 1296 देवगिरी पर हमला बोला.रामचंद्र देव के राज में अलाउद्दीन खिलजी ने तन 1296 देवगिरी पर हमला बोला और उसने जीत हासिल की बाद में मलिक काफूर ने रामचंद्र और उसके बेटे शंकरदेव के खिलाफ भी लड़ाई का साथ दिया.इसमे शंकरदेव मारा गया सन 1306 साथ और 1312 में यह घटना हुई उसके बाद.मुबारक शाह खिलजी ने एक और हमला किया और जीत हासिल करके किल्ला दिल्ली की सल्तनत में शामिल कर लिया.इसके बाद दिल्ली में खिलजी परिवार का बादशाह बना मोहम्मद बिन तुगलक 



ने देवगीरी किल्ले का नाम बदलकर दौलताबाद रख दिया और इसकी खासियत हो और कभी ना जीती जाने वाली खासियत को समझते हुए उसने सन 1328 ने अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर दौलताबाद को बना दिया.उसके कुछ ही दिन बाद मोहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी फिर से दिल्ली को बना लिया फिर 1387 शैतान इसमें यह किला हसन गंगू के अधीन बहमनी राजाओं के हाथों में चला गया उसके कुछ साल बाद सन 1499  में अहमदनगर की निजाम के हाथ में यह किला चला गया फिर से.सन 1607 में दौलताबाद निजाम सहयोग की राजधानी बना ली आखिर में बादशाह अकबर और शाहजहां के राज में मुगलों ने यहां पर कई हमले किए आखिर में शाहजहां के राज में 4 माह की घेराबंदी के बाद 1633 में यह पूरा एरिया में मुगलों के राज में चला गया इसके बाद भी बहुत से मले हुए.और बहुत से बादशाहाओं ने यहां पर  बादशाही की जैसे कि मुगलों ने मराठों ने पेशवाओं ने  और आखिर में खिला हैदराबाद के निजाम के हाथ में चला गया सन 1724 में किला हैदराबाद के निजाम के हाथ में चला गया और 1724 से लेकर आजादी मिला उन्हीं के हाथों में रहा.उन्हीं के हाथों  में रहा इसके लिए पर आने के लिए आपको पहले स्टेशन से आप आ सकते हैं जोकि किले से 17 किलोमीटर पड़ता है और आपको मुंबई देनी पुणे हैदराबाद नासिक जैसे कई शहरों को जोड़ता है या फिर आप बस या टैक्सी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं आज के वीडियो में इतना ही उम्मीद करते हैं क्या



देवगीरी किल्ले का इतिहास


महाराष्ट्र के दक्षिण में स्थित देवगिरी यादव साम्राज्य की प्रमुख घटनाओं और प्रतापी सम्राटों के बारे में.देवगीरी यादव साम्राज्य की स्थापना 860 ईसवी में द्रृडप्रहारा ने की थी .देवगीरी यादव.साम्राज्य का विस्तार नर्मदा नदी से लेकर तुंगभद्रा नदी तक फैला था.एक विशाल साम्राज्य था इसके अंतर्गत आधुनिक महाराष्ट्र उत्तरी कर्नाटक.मध्य प्रदेश के कुछ भाग.गोवा तथा आंध्रप्रदेश का कुछ हिस्सा. था इस साम्राज्य की राजधानी देवगिरी थी जो वर्तमान में दौलताबाद के नाम से जाना जाता है.. देवगिरी के यादोव की प्रारंभिक भाषा संस्कृत व कन्नड़ थी.साम्राज्य के शुरुआती कुछ राजाओं के नाम कन्नड़ भाषा के हैं.द्डप्रहर राजा के बाद 
सुनचंद्र राजा बने उनके नाम.अआरे साम्राज्य को शेवनासाम्राज्य भी कहा जाता है.शास्त्रकारों ने के मुताबिक़ साम्राज्य के सभी शासकों को यदुवंशी अहीर बताया है.चंद्रवंशी क्षत्रिय माना है इस साम्राज्य के शासकों ने.भी खुद को द्वारका का यादव बताया है.खुदके लिए यदुवंशी तिलक द्वारका वाटी पूर वाढदिश्वर अर्थात द्वारका.ए मालिक का प्रयोग किया है.शेवना राजवंश खुद को उत्तर भारत के यादवों से अवतरित मानता है. यही.उत्तर भारत से आए थे.कनिका 1334 में दिल्ली सल्तनत के शासकों ने अंत किया.यह साम्राज्य.लगभग 500 वर्षों तक चला .


द्रृडप्रहारा
इन्होंने यादव साम्राज्य की स्थापना 860 ईसा में की थी..880 ईसवी तक शासन किया इनसे पहले के शासक राष्ट्रकूट शासकों के सामंत शासक थे 
द्रृडप्रहारा 860 के आसपास एक योद्धा थे.लोगों की रक्षा की इस कारण लोगों.अपना राजा स्वीकार किया और कर देना आरंभ कर दिया.अमर नूरी इसका अर्थ होता है चित्र गांव का रक्षक हैं इन्होंने.अपने राजधानी का नाम चंद्रत्यपुरा  रखा जो आधुनिक चंदेरी है.इनके बाद उनके पुत्र सुनचंद्र शासक बने इनका शासनकाल 880 से 900 ईसवी तथा उनके इलाके को शेवना देश कहा जाता था इन्होंने परमारो के खिलाफ राष्ट्रकूट ओं की मदद की थी.राष्टकुट को अपना वंशज मानते थे.शायद यही कारण था कि.सुनचंद्र ने परमारो के खिलाफ.राष्टकुटो की मदद की थी.सेवनचंद्र ने शेवनपुराआधुनिक सिंध नामक शहर.स्थापना की थी.इसके बाद.
धाडीअप्पा 
   शासक बने उनका शासन  शासनकाल 900 ईसवी से 925 ईसवी तक था इनके बाद 925 में भील्लम प्रथम शासक बने इनके के बाद 950.मे 
राजुगी शासक बने इनके बाद वेडुगी प्रथम 950 में शासक बने इनका विवाह राष्ट्रकूट राजकुमारी से हुआ था इन्होंने राष्ट्रकूट शासकों के सैन्य अभियान में भाग लिया था इनके बाद.धाडीअप्पा सेकंड 970 ईसवी में शासक बने इनका शासनकाल 970 से 985 ईसवी तक था.
भील्लम व्दितीय

धाडीअप्पा के बाद इनके पुत्र भील्लन द्वितीय 950 ईसवी में शासक बने भील्लम द्वितीय ने अपने मित्र चालू कि शासक के कैल्लकी परमार शासक मुंज ने प्रमुख भूमिका.निभाई थी। भील्लम व्दितीय एक वीर तथा पराक्रमी योद्धा थे इन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार क ई क्षेत्र तक किया वैसुकी प्रथम भील्लम  द्वितीय के बाद 
उनके पुत्र वेशयुकी शासक बने इनका विवाह गुजरात के चालूक्य  सामंत की बेटी नायरा देवी से हुआ था इनका शासनकाल 1005-1025 इसवी तक था.भील्लम तृतीय वेसुकी प्रथम के बाद इनके पुत्र भील्लम तृतीय शासक बने इनका शासनकाल 1025 से 1050 तक था.इनके बारे में जानकारी इनके द्वारा बनवाए गए अपने कलर्स मुद्रक अनुदान शिलालेख से मिलती है इन्होंने चाल्युक्य  राजा जयसिम्हन द्वितीय की बेटी अवल देवी से विवाह किया इन्होंने अपने ससुर जैयसिम्हन और इन के बहनोई सोमेश्वर प्रथम की परमार राजा भोज के खिलाफ मदद की थी.वेसुकी व्दितीय इनके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है सुनचंद्र व्दित्तीय इन्होंने खानदेश इलाके को अपने राज्य में मिला या 1069 के एक शिलालेख  के अनुसार उनके पास सात मंत्रियों की परिषद थी शेवनचंद्र द्वितीय ने चालूक्य अपने भाइयों सोमेश्वर द्वितीय और विक्रमादित्य व्दितीय के बीच उत्तराधिकार की लड़ाई में 

विक्रमादित्य व्दितीय 

  विक्रमादित्य व्दितीय की मदत की थी और.विक्रमादित्य को राजा बनाया इसमें शेवनचंद्र द्वितीय के पुत्र ऐरमदेव ने सहायता की थी.ऐरमदेव इस 1050 से 1105 तक शासन किया है ऐरमदेव के बाद इनके भाई सिंम्हन राजा बने.इनको सिंघन के नाम से भी जाना जाता है 1105 में राजा बने इनका शासनकाल 1105 से 1145 भीतर था इन्होंने इलहारा भोज व्दितीय को हराकर एलारा राज्य को यादव साम्राज्य में लाया 1220 में गुजरात के लाता क्षेत्र को जीतने को अपने सामंत फुलेश्वर को भेजा इसने लाता श्रेत्र को जीत  लिया 
मलुगी का शासन काल
मलुगी का शासन काल 1145-1160 तक था ।मलूनी के सामंत दादा और उनके बेटे महिद्धारा ने चालक के राजा तलब तृतीय के दुश्मन यादव वंशी कलचुरी राजा 
विल्लया व्दितीय से युद्ध किया और.अकोला इलाका जीतकर अपने राज्य में लाया यादों में शासकों के दस्तावेजों में बताया गया है कि उन्होंने उत्कल राजा के हाथी जप्त कर लिए थे तथा काकतीय शासक रूद्र पर हमला किया था और कुछ इलाका बढ़ाया मलुगी के बाद इनका बड़ा पुत्र अमर गांगनेर राजा बना.अमर गांगे के बाद उनके बेटे अमर मलुगी राजा बने 


भील्लम पंचम 
1175 में बलम पंचम देवगीरी के शासक बने.कौशल यादव वंशी राजा बीरबल लाल व्दितीय ने  सोमेश्वर को हराकर कल्याणी पर अधिकार कर लिया सोमेश्वर राजधानी छोड़कर भाग गया भील्लम पंचम ने कल्याणी के यादव शासक विरवरलाल व्दितीय को हराकर कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया और अपनी राजधानी बनाया.भील्लम पंचम ने देवगीरी शहर
की स्थापना और किल्ला बनवाया और देवगीरी को अपनी राजधानी बनाई 
जैतुगी
 भील्लम पंचम पुत्र जैतुगी 1194 के आसपास का काकतीय को जीता और काकतीय राजाने देवरी की अधीनता स्वीकार की 
सिंघन व्दितीय
 जैतुकी बाद इनके पुत्र 1200 के आसपास शासक  बने यह इस वंश के सबसे महान शासकों में से एक थे 1215 में उत्तरी परमार राज्य पर अधिकार कर लिया.इसमें इन्होंने परमार राजा अर्जुन ब्रर्मन को मारा था इनके समय देवगिरी साम्राज्य उत्तर में नर्मदा नदी दक्षिण में तुम भद्रा नदी पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में आंध्र प्रदेश के पश्चिम भारत में फैहला था.द्वार समुद्र के यादवों के कार्य क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था 
सम्राट कृष्ण सिंम्हन के बाद उनके पुत्र क्रिष्ण सम्राट बने इन्होंने 1250 में परमार राजा को हराया तथा.गुजरात के दाता राज्य के बालखेला राजा को भी हराया उन्होंने कर्नाटक के कौशल यादव से भी युद्ध किया 
सम्राट महादेव 
    सम्राट कृष्ण के बाद उनके छोटे भाई महादेव ने शासन किया इन्होंने 1268 में होलसेल यादव की राजा नरसिंह पर आक्रमण किया.इसे नरसिंह ने विफल कर दिया महादेव के बाद उनके पुत्रअमन्ना बहुत छोटे समय के लिए शासक बने सम्राट राम चंद्रदेव यह सम्राट कृष्ण के पुत्र थे 1270 में देवरी साम्राज्य के सम्राट बने जिन्होंने सम्राट बनते ही उत्तरी परमारो पर आक्रमण किया और आसानी से हरा दिया.जब द्वारासमुद्र के यादों ने इनकी राज्य पर आक्रमण किया तो 1276 में द्वार समुद्र के यादव राजा उन्होंने पराजित किया लेकिन रायचूर सहित अपने कुछ इलाके को दिए जिन पर द्वार समुद्र के यादवों का कब्जा हो गया सम्राट रामचंद्र देव के पुरुषोत्तम पुरी शिलालेख से पता चलता है कि उन्होंने उत्तर पूर्व सीमा पर यादव साम्राज्य का विस्तार किया इन्होंने ब्रजतारा वैरागढ़ और भंडारा को अपने राज्य में मिलाया.इन्होने कलचुरी यादवों को हराकर उनकी राजधानी त्रिपुरी पर कब्जा कर लिया इन्होंने वाराणसी में एक मंदिर का निर्माण कराया वाराणसी पर उनका कब्जा 2 वर्षों तक रहा इन्होंने को कण के यादव सामंतपेड़ और संगमेश्वर के विद्रोहो को दबाया सम्राट रामचंद्र के 1278 के शिलालेख के अनुसार रामचंद्र ने 1270 में मलेछी गृपो की सेना को हराया 1278 शिलालेख में इन्हें तुरको से पृथ्वी को बचाने वाला महान शासक बताया गया है.इधर दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दीन ने गुजरात में कर्णवाघेला को हराया और उनकी सुंदर पत्नी कमला देवी को अपने पास रख लिया कर्णवाघेला ने अपनी पुत्री के साथ देवगीरी में शरण ली सम्राट रामचंद्र ने कर्णवाघेला को अपना भाई का और उसे अपने यहां शरण ही नहीं दी बल्कि एक जागीर भी दी। फिर अलाउद्दीन खिलजी कर्णवाघेला का पीछा करते-करते देवरी आया और देवगीरी पर 1296 में आक्रमण किया.महिनो के घेराबंदी के बाद भी देवगिरी राज्य पर कोई असर नहीं हुआ कुछ समय राजकुमार शंकरदेव दक्षिण में विद्रोह को दबाने के लिए सेना लेकर गए थे महीनों की घेराबंदी से देवरी के किल्ले में खाने पीने की वस्तुओं की कमी होने लगती है तो सम्राट रामचंद्रदेव बची सेना को मुगली सेना का सामना करने का आदेश देते हैं फिर मुस्लिम खिलजी और यादव हिंदू की सेना युद्ध होता है.युद्ध के दौरान शंकरदेव दक्षिण अभियान से सेना लेकर लौट आते हैं और मुस्लिम सेना पर आक्रमण कर देते हैं इस दो तरफा हमले से मुस्लिम सेना के पैर उखड़ जाते हैं शंकरदेव और अलाउद्दीन खिलजी में आमने-सामने से युद्ध होता है इसमें खेलनी पराजित होकर भाग जाता है फिर खिलजी अपनी मक्कारी दिखाता है हिंदू सेना में राजकुमार शंकरदेव की मृत्यु की अफवाह फैला देता है जिससे कि हिंदू सेना में भगदड़ मच जाती है.सम्राट रामचंद्र देव अलाउद्दीन से संधि कर लेते हैं और वार्षिक कर देना स्वीकार कर लेते हैं दिल्ली लौटते समय अलाउद्दीन के सैनिक कर्णवाघेला पर हमला करते हैं और उसकी पुत्री देवल देव को अलाउद्दीन के पास भेज देते हैं रामचंद्र देव अलाउद्दीन को न कर देते हैं नहीं संधि को मानते हैं परिणाम स्वरूप अलाउद्दीन ने 1307 में ख्वाजा हाजी और मलिक काफूर के नेतृत्व में देवरी के लिए ना भेजें.अल्लाउद्दीन ने मालवा और गुजरात के मुस्लिम राज्यपालों को सेना की मदद का आदेश दिया खिलजी की इस विशाल सेना के आगे देवगिरी की सेना ज्यादा समय तक टिक नहीं पाती फिर सम्राट राम चंद्र देव को दिल्ली भेज दिया जाता है जहां अलाउद्दीन ने सम्राट रामचंद्र देव के साथ नरमी बरती और उन्हें राय रायन की उपाधि दी गुजरात की एक जागीर भी सम्राट रामचंद्र देव को भेट स्वरूप दी।सम्राट रामचंद्र देव की मृत्यु के बाद उनके पुत्र शंकरदेव सिंहासन पर बैठते हैं उन्होंने हर संधि तोड़ दी और फिर से अपनी सेना को सुदृढ़ बनाया इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने 1313 में देवरी पर आक्रमण करने को फिर से सेना भेजी तीसरी बार फिर से हिंदुओं और दिल्ली सल्तनत के मुस्लिम शासकों की सेना आमने-सामने थी सम्राट शंकर देव ने बड़ी बहादुरी से मुस्लिम सेना का सामना किया लेकिन वह वीरगति को प्राप्त हुए इसके बाद मलिक काफूर दक्षिण अभियान को निकल गया शंकरदेव के बाद 
हरपाल देव
    1313 ईस्वी में सम्राट रामचंद्रदेव के जमाता हरपालदेव यादव देवरी की राज गद्दी पर बैठे और कई वर्षों तक शासन करते रहे जब दिल्ली में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई तो उन्होंने मुस्लिमों द्वारा कब्बजाए क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया और उन इलाकों पर कब्जा कर लिया जब यह खबर दिल्ली के सुल्तान को मिली तो उसने देवरी पर आक्रमण करने को सेना भेजी दिल्ली के मुस्लिम शासकों का चौथा हमला था जिसमें हिंदुओं की हार होती है.हरपालदेव को दिल्ली लाया जाता है जहां उनके सामने इस्लाम कबूल करने की शर्त रखी जाती है कहा जाता है अगर वह इस्लाम स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें उनका राज्य लौटा दिया जाएगा लेकिन हरपालदेव ने हिंदू धर्म नहीं छोड़ा अंत में दिल्ली के मुस्लिम शासकों ने सम्राट हरपालदेव की जिंदा रहते खाल निकलवा दी लेकिन इसके बावजूद भी उन्होंने हिंदू धर्म नहीं छोड़ा फिर हरपालदेव को दिल्ली सल्तनत के मुस्लिमों ने 
उबलते तेल में डाल दिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई इस तरह सम्राट हरपाल देव मुस्लिमों के हाथों शहीद हुए उनके साथ ही देवगिरी के हिंदू यादव साम्राज्य का भी अंत हो गया मुस्लिमों ने देवगीरी का नाम बदलकर दौलताबाद रख दिया
✈️एलोरा गुफाएं जानकारी
✈️अजंता गुफाएं जानकारी

दौलताबाद किल्ले की तस्वीरें















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